Writer: Meera Nanda
Translators: Akshat and Shahadat
Synopsis: जब विज्ञान को वेदों से प्रमाणित किया जाने लगे और धर्म को आधुनिकता का स्रोत बताया जाए, तब समझिए कि हम सत्य-विपरीत समय में जी रहे हैं। मीरा नंदा की यह पुस्तक दिखाती है कि किस प्रकार हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा ने वैज्ञानिक विवेक को धार्मिक अनुभूति और आध्यात्मिक दावों के अधीन करने का प्रयास किया है। आयुर्वेद से लेकर खगोलशास्त्र तक, योग से लेकर शिक्षा नीति तक, यह किताब उन प्रक्रियाओं की पड़ताल करती है जिनके माध्यम से मिथक को इतिहास, आस्था को ज्ञान और धर्म को विज्ञान के रूप में स्थापित किया जा रहा है। यह केवल विज्ञान पर हमला नहीं है; यह लोकतंत्र, शिक्षा, तर्कशीलता और सार्वजनिक जीवन में सत्य के स्थान पर भी प्रश्नचिह्न है। ‘सत्य-विपरीत भारत: विनाशकाल की नियमावली’ हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक और राजनीतिक संकट की निर्भीक पड़ताल है।
About the author: मीरा नंदा हमारे समय की उन विरल लेखिकाओं और विचारकों में हैं जो विज्ञान और धर्म के रिश्ते को गहराई और साहस के साथ समझती हैं। मूल रूप से जीवविज्ञान की छात्रा रहीं मीरा नंदा ने आगे चलकर विज्ञान-दर्शन में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। उनका काम यह पूछता है कि जब विज्ञान को धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान के ढांचे में बांध दिया जाता है, तो ज्ञान और सत्य की परिभाषाएं कैसे बदल जाती हैं। उन्हें अमेरिकन काउंसिल ऑफ लर्न्ड सोसाइटीज़ और जॉन टेम्पलटन फाउंडेशन जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से शोधवृत्तियां प्राप्त हुईं हैं। वह 2009–10 में जेएनयू के जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में विज़िटिंग फ़ेलो भी रहीं। उनका लेखन अपने समय के निर्णायक सवाल से जूझता है— क्या विज्ञान और आस्था एक साथ खड़े हो सकते हैं, या धर्म के दबाव में विज्ञान अंततः झुक जाता है?





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