Writer: Ghassan Kanafani
Translator: Inam Nadeem
Synopsis: “तुम एक इंसान को मार सकते हो, मगर उस कहानी को नहीं, जो उसने सुनाई हो।” इस किताब में वही कहानियां सांस ले रही हैं— ज़ख़्म-ख़ुर्दा, मगर ज़िंदा! ग़स्सान कनफ़ानी महज़ फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध का एक चमकदार चेहरा नहीं, बल्कि अरबी अदब के उन विरले नामों में हैं, जिन्होंने अंदरूनी तड़प और इंसानी जीजीविषा को बेमिसाल ज़बान दी। उनकी कहानियां उन रोज़मर्रा के किरदारों की दास्तान नोहा हैं, जो अपनी सरज़मीं से बेदख़ल होकर ख़्वाब और भूख के दोराहों पर झूल रहे हैं। कनफ़ानी ने फ़िलिस्तीनी वजूद के बिखरे हुए लम्हों को जिस शिद्दत के साथ समेटा है, वह हिंदुस्तानी पाठकों को एक गहरे मानवीय तजुर्बे से रूबरू कराता है। यह अनुवाद उनकी शैली की सादगी, रूहानी ताक़त और जज़्बाती गहराई को हिंदी संसार तक पहुंचाने की एक ईमानदार कोशिश है।
About the writer: ग़स्सान कनफ़ानी (1936–72) आधुनिक फ़िलिस्तीनी अदब का वह विश्वसनीय नाम हैं, जिनके बग़ैर प्रतिरोध का साहित्य अधूरा है। कथाकार, बेबाक पत्रकार और सियासी विचारक के तौर पर उन्होंने विस्थापन और संघर्ष की दुनिया को कालजयी अभिव्यक्ति दी। साहित्य तक ही सीमित नहीं, वह ‘पॉपुलर फ़्रंट फ़ॉर द लिबरेशन ऑफ़ फ़िलिस्तीन’ के प्रमुख प्रवक्ताओं और विचारकों में भी थे। उनकी साहित्यिक और सियासी मौजूदगी इतनी असरदार थी कि 8 जुलाई 1972 को इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी ‘मोसाद’ ने उनकी हत्या कर दी।




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