इतिहास बन चुका, आकाशवाणी लखनऊ का ‘उत्तरायण’कार्यक्रम आज भी बहुत सारे लोगों की स्मृतियों में गूँजता है, जिसने उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं के स्थापित एवं नवोदित रचनाकारों-गायकों-वादकों को व्यापक मंच दिया और अनेक नई प्रतिभाओं को अपनी लोकभाषाओं में लिखने-बोलने के लिए प्रेरित किया। ‘आँखर’नाम की संस्था और इसी नाम की पत्रिका को भी पुराने लोग भूले न होंगे। इनको उल्लेखनीय और यादगार बनाने में मुख्यत: बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु की ही जिद और मेहनत थी। यह पुस्तक मूलत: कुमाउंनी भाषा-बोली के लिए लम्बे समय तक किए गए ‘जिज्ञासु’जी के संघर्षों और योगदान पर केंद्रित है।
‘उत्तरायण कार्यक्रम के इतिहास और उसकी भूमिका पर विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास भी इस पुस्तक में किया गया है। ‘शिखर संगम तथा ‘आँखर’संस्था की लोकभाषा नाट्य-प्रस्तुतियों के विवरण के साथ-साथ इसमें ‘आँखर पत्रिका की सम्पादकीय दृष्टि तथा उसमें प्रकाशित विविध साहित्य की गुणात्मक चर्चा करने का प्रयास भी किया गया है।
जिज्ञासु जी की कुमाउंनी व हिंदी कविताओं के मूल्यांकन के साथ-साथ कुमाउंनी कविता की यात्रा की कुछ झलक भी यहाँ मिलेगी। कुमाउंनी की सर्व प्रथम पत्रिका ‘अचल और उसके बाद की अन्य कुमाउंनी पत्रिकाओं और उनके संकटों-संघर्षों की भी थोड़ी चर्चा यहाँ होगी।




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