रूसी क्रांति और साहित्य संस्कृति – गोपाल प्रधान (इतिहास) 2018 | पेपरबैक

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  • लेखक: गोपाल प्रधान 
  • पृष्ठ: 86,  काग़ज़ : 70 gsm नेचुरल शेड, साइज़: पॉकेट बुक    
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1917 की रूसी क्रांति मानव इतिहास की कुछ युगांतरकारी घटनाओं में से एक है जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया।

मार्क्स एंगेल्स को उम्मीद थी कि आगे बढ़े हुए देशों में भी मजदूर क्रांति होगी किन्तु सबसे प्रभावशाली और सशक्त प्रयास रूसी मजदूर वर्ग के नाम पर दर्ज हुआ। क्रांति ने जनता के शासन की संस्था के रूप में सोवियतों को आकार दिया। सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित इन सोवियतों ने पूरी क्रांति में बेहतरीन भूमिका निभाई।

रूसी क्रांति के कारण दुनिया भर के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के साथ घनिष्ठ सम्बंध कायम हुए और पूरे विश्व के प्रगतिशील बौद्धिकों और किसान मजदूर आंदोलनों का वैचारिक जुड़ाव सोवियत संघ के साथ बना।

रूसी क्रांति को सदैव विपरीत परिस्थितियों से जूझना पड़ा। पूंजीवाद के साथ उसकी निरंतर लड़ाई के परिणामस्वरूप उस प्रयोग और सपने में तमाम विकृतियों का जन्म हुआ। लगभग सात आठ दशक तक जूझने के बाद आंतरिक और बाह्य समस्याओं के आगे इस कोशिश ने दम तोड़ दिया। कहते हैं कि वर्तमान के सबसे गंभीर युद्ध अतीत के नाम पर लड़े जाते हैं। मौजूदा समय के संघर्ष में इस किताब को बतौर एक योगदान देखा जाना अपेक्षित है। इस किताब को मार्क्सवादी अध्येता गोपाल प्रधान ने तैयार किया है।

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